भारत छोड़ो आंदोलन के कारण व परिणाम

भारत छोड़ो आंदोलन- मार्च 1942 ई. में सर स्टेफर्ड क्रिप्स कुछ प्रस्तावों के साथ भारत आए।प्रस्ताव के अनुसार सुरक्षा के अतिरिक्त भारतीयों को भारत सरकार के सभी विभाग हस्तांतरित करने की बात कही गई थी। क्रिप्स का प्रस्ताव ‘ स्वीकार करो अथवा छोड़ दो’ की भावना पर आधारित था इसे भारतीयों ने स्वीकार नहीं किया। अंत में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने 8 अगस्त 1942 ई. को ‘भारत छोड़ो’ प्रसिद्ध प्रस्ताव स्वीकार कर दिया तथा आंदोलन की बागडोर गांधीजी को सौंप दी।

भारत-छोड़ो-आंदोलन

सन 1942 ईस्वी में क्रिप्स मिशन की असफलता से भारत की जनता रुष्ट हो गई। उन्हें लगता था कि देश की राजनीतिक स्थिति अब सहनशीलता के बाहर हो चुकी है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान वस्तुओं की कमी और बढ़ती कीमतों ने उनके असंतोष को और भी गहरा कर दिया था।

कांग्रेस ने अब फैसला किया कि अंग्रेजों से भारतीय स्वाधीनता की मांग बनवाने के लिए सक्रिय उपाय किए जाएं। गांधीजी ने अंग्रेजो से भारत छोड़ने की अपील की।अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक 8 अगस्त, 1942 ईस्वी को मुंबई में हुई जिसमें प्रसिद्ध “भारत छोड़ो आंदोलन” का प्रस्ताव स्वीकार किया गया। इस उद्देश को पाने के लिए गांधी जी के नेतृत्व में एक अहिंसक जन संघर्ष चलाने का फैसला किया गया।

भारत छोड़ो आंदोलन प्रस्ताव में कहा गया कि–भारत में ब्रिटिश राज्य का तुरंत अंत होना चाहिए। यह भारत तथा मित्र देशों की सफलता के लिए आवश्यक है। इसी आंदोलन में गांधीजी ने “करो या मरो” का नारा दिया था। गांधीजी ने कहा कि- हम या तो हमारा भारत को स्वतंत्र कराएंगे या इस प्रयास में मारे जाएंगे, मगर हम अपनी पराधीनता को जारी रहते देखने के लिए जीवित नहीं रहेंगे। लेकिन कांग्रेस आंदोलन को और अधिक हवा दे सके इसके पहले ही गांधीजी तथा अन्य कांग्रेसी नेताओं को गिरफ्तार करके अनजानी जगह पर ले जाया गया और कांग्रेस को पुनः एक बार फिर गैरकानूनी घोषित कर दिया गया।

अंग्रेजी सरकार के इस दमनात्मक व्यवहार से भारतीय जनमानस में खलबली मच गई जिसके परिणाम स्वरुप कहीं-कहीं पर आंदोलन में हिंसात्मक स्वरूप धारण कर लिया। मुंबई (अब मुंबई) में विद्रोह फैल गया। दिल्ली, अहमदाबाद, खेड़ा नगरों में यह आंदोलन फैलता हुआ समस्त भारत में फैल गया। सरकारी कार्यालय, रेलवे स्टेशन, पुलिस चौकी और डाकखाना में आग लगाई गई। रेलवे लाइनों और बिजली की लाइनों को क्षति पहुंचाई गई। गिरफ्तारी, लाठीचार्ज और गोलियों से आंदोलन को दबाने के लिए सरकार ने पूरी ताकत लगा दी। मुस्लिम लीग ने इस आंदोलन में कांग्रेस का साथ नहीं दिया।

अंग्रेजी सरकार अंत में आंदोलन को कुचलने में सफल रही। बाद में अंग्रेजी सरकार ने गांधी जी को उनकी अस्वस्थता को देखते हुए जेल से रिहा कर दिया। भारत छोड़ो आंदोलन अपने प्रमुख उद्देश्य अंग्रेजों को भारत से निष्कासित करने में असफल रहा। डॉ. अंबा प्रसाद ने इसके विषय में लिखा, “इस आंदोलन ने 1947 ईस्वी में भारतीय स्वतंत्रता के लिए पृष्ठभूमि तैयार की थी।”

भारत छोड़ो आंदोलन के कारण

1) पहला कारण था कि जापान के आक्रमण का भय बढ़ रहा था। गांधीजी चाहते थे कि भारत को उस आक्रमण से बचाया जाए  यह तभी हो सकता था जब अंग्रेज लोग भारत को छोड़ देते।

2) दूसरा कारण यह था कि अंग्रेजों की हर जगह हार हो रही थी। उनके हाथों से सिंगापुर और बर्मा निकल गए। गांधी जी का यह विचार था कि यदि अंग्रेजों ने हिंदुस्तान को ना छोड़ा तो इस देश के लोगों की भी वही दुर्दशा होगी जो बर्मा (अब म्यांमार) और मलाया के लोगों की हुई थी। गांधी जी का विचार था कि यदि अंग्रेज लोग भारत छोड़ जाए तो जापान भारत  पर आक्रमण नहीं करेगा।

3) आंदोलन का प्रारंभ करने का एक और कारण था कि हिटलर और उसके साथियों का प्रॉपेगण्डा बढ़ गया था और उसका प्रभाव भारतीयों पर भी पड़ रहा था। सुभाषचंद्र बोस स्वयं बर्लिन से हिंदुस्तानी भाषा में ब्रॉडकास्ट कर रहे थे। ऐसा महसूस किया गया कि भारत की रक्षा के लिए उत्साह पैदा किया जाए, और ऐसा तभी हो सकता था जब देश में एक व्यापक आंदोलन हो।

4) बर्मा (अब म्यांमार) छोड़ने के समय हिंदुस्तान के लोगों से अच्छा व्यवहार नहीं किया गया। उनको भारत लौटते समय अनगिनत कष्ट सहने पड़े। इसका परिणाम यह हुआ कि भारत में अंग्रेजों के विरुद्ध बहुत रोष उत्पन्न हो गया। इस वातावरण ने भी गांधी जी को आंदोलन चलाने के लिए विवश किया।

5) द्वितीय विश्वयुद्ध के दिनों में अंग्रेजों ने भारत में सब कुछ जलाने की नीति को अपनाया। इस नीति से बहुत से हिंदुस्तानियों की हानि हुई  कई लोगों की जमीनें नष्ट हो गई और उनको पर्याप्त मुआवजा ना दिया गया। कईयों की रोटी छिन गई। वस्तुओं की कीमतें बढ़ गई। देश में असंतोष बढ़ गया  ऐसी स्थिति से लाभ उठाने के लिए गांधी जी ने अपना आंदोलन आरंभ किया।

भारत छोड़ो आंदोलन के परिणाम

1)भारत छोड़ो आंदोलन का तत्कालीन परिणाम यह था की ब्रिटिश सरकार ने महात्मा गांधी और कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सभी सदस्यों को जेल भेज दिया। कांग्रेश संस्था को कानून के विरुद्ध घोषित कर दिया गया। उसके कार्यालय पर पुलिस ने कब्जा कर लिया। यह नीति सरकार ने कांग्रेस को कुचलने के लिए अपनाई।

2) साधारण जनता हाथ-पर-हाथ रखकर न बैठी रही, उसने भी सरकार के विरुद्ध विद्रोह आरंभ कर दिया। गांधीजी के मन में यह विचार ही न था कि सरकार उन्हें अकस्मात बंदी बना लेगी। इसका परिणाम यह हुआ कि गांधीजी और कांग्रेस के अन्य नेताओं के गिरफ्तार होने के बाद आंदोलन का पथ प्रदर्शन करने के लिए कोई नेता न रहा। जैसे लोगों के मन में आया उन्होंने वैसा ही किया।

3) जब सरकार ने निर्दोष पुरुषों, स्त्रियों, तथा बच्चों को गोली से उड़ा दिया तब लोगों ने भी हिंसा की नीति अपनाई। जहां कहीं विदेशी मिले, उनको मार डाला गया।बहुत कठिनाइयों के बाद ब्रिटिश सरकार अपनी सत्ता को देश में फिर से स्थापित करने में सफल हुई।

4) राष्ट्रवादियों को राष्ट्रीय आंदोलन से अलग करने के लिए काला पानी की सजा भी दी जाती थी। अंडमान निकोबार द्वीप समूह काला पानी के नाम से जाना जाता था, जहां छोटी-छोटी कोठरिया होती थी और बंदियों को अनेक अमानवीय यातनाएं दी जाती थी। काला पानी की सजा देशनिकाला तथा आजीवन कारावास की कठोरतम सजा थी।

भारत छोड़ो आंदोलन असफलता के प्रमुख कारण

(1) आंदोलन का असंगठित होना- भारत छोड़ो आंदोलन का प्रमुख कारण यह भी था कि सभी जगह आंदोलनकारी संगठित नहीं थे। वे बिना उच्च नेताओं की सलाह -मशविरा के अपनी कार्यवाही को अंजाम दे रहे थे।

(2) प्रमुख नेताओं का जेल में बंद होना- अंग्रेज सरकार की दमनात्मक नीति के तहत भारत के सभी प्रमुख नेताओं को अनजान जगहो पर ले जाकर बंद कर दिया था। परिणामस्वरूप आंदोलनकारियों को उचित मार्गदर्शन नहीं मिल पा रहा था। इस प्रकार प्रमुख नेताओं को जेल में बंद कर देना भी आंदोलन की असफलता का कारण सिद्ध हुआ।

(3) अन्य नेताओं का एकमत ना होना- प्रमुख कांग्रेसी नेता; जैसे- गांधी जी, नेहरु जी आदि को तो ब्रिटिश सरकार ने गुप्त स्थानों पर भेज दिया शेष बचे हुए नेताओं तथा मुस्लिम लीग ने नेताओं में एकमत नहीं था। इस प्रकार नेताओं का एकमत न होना भी आंदोलन की असफलता का कारण बना।

(4) भारत छोड़ो आंदोलन का हिंसात्मक हो जाना- आंदोलनकरियो का हिंसात्मक रूप भी असफलता का प्रमुख कारण था। जिसे दबाने के लिए भी अंग्रेजों ने और अधिक क्रूरता का रूप धारण कर लिया।

(5) सभी वर्गों की भागीदारी का अभाव- मुस्लिम लीग जोकि प्रारंभ से ही स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए निरंतर संघर्ष कर रही थी लेकिन भारत छोड़ो आंदोलन के समय वह भी मूकदर्शक बनी रही।

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